सूरसागर में एक संवाद का वर्णन किया गया है जो कि उद्धव एवं गोपियों से संबंधित है। जिसे भ्रमरगीत की संज्ञा दी गई है । यह गोपियों के विरह भाव को प्रकट करता है । ब्रज क्षेत्र से मथुरा जाने के बाद श्री कृष्ण जी ने गोपियों को कभी कोई संदेश नहीं भेजा था और ना ही स्वयं कभी उनसे मिलने आए ,परिणाम स्वरूप गोपियों की विरह वेदना बढ़ गई। श्री कृष्ण जी ने उनकी विरह पीड़ा को कुछ कम करने के लिए उधो को भेज दिया। जिन्हें उद्धव भी कहते हैं । उद्धव जी ज्ञान मार्ग पर चलने वाले थे । उन्होंने निर्गुण मार्ग का संदेश गोपियों को दिया । गोपियों को उनका यह संदेश पसंद नहीं आया। जब गोपियां एवं उद्धव परस्पर बातचीत कर रहे थे , तभी वहां पर एक भ्रमर (भंवरा )विचरण करता हुआ आ गया , गोपियों ने उसी भ्रमर को माध्यम बनाया और व्यंग्य रूप में उद्धव को अपने मन की बात कही । अंत में स्वयं उद्धव जी सगुण मार्ग को अपना लेते हैं
सूरदास के पद भाग 1
ऊधौ ,तुम हो अति बड़भागी ।
अपरस रहत सनेह तगा तैं ,
नाहिन मन अनुरागी ।
पुरइनि पात रहत जल भीतर ,
ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माह तेल की गागरी,
बूंद न ताको लागी ।
'प्रीति - नदी ' मैं पाउँ न बोरयौ ,
दृष्टि न रूप परागी ।
सूरदास ’ अबला हम भोरी ,
गुर चाँटी ज्यौं पागी ।।
शब्दार्थ:
ऊधौ - उद्धव (एक व्यक्ति), अति -बहुत अधिक, अपरस- निर्लिप्त- अछूता, स्नेह- प्रेम ,तगा -बंधन, तैं- से, नाहिन-न ही ,मन -हृदय, अनुरागी - आसक्ति,पुरइनि -कमल,पात -पत्ता ,रहत-रहता है, जल-पानी, भीतर-अंदर , ता - उसका /उसके, रस - पानी,न दागी -स्पर्श ,ज्यौं - जैसे, जल माह - पानी में, गागरी- मटकी( छोटा घड़ा ), ताको - उसको ।
प्रीति-नदी - प्रेम रूपी नदी ,पाउँ - पांव,न बोरयौ- नहीं डुबोया, दृष्टि - आँख, रूप - सौंदर्य,परागी- आसक्ति, मोहित होना।
अबला - कमजोर( नारी का पर्यायवाची ) भोरी - भोली - सरल , गुर - गुड़ ,चाँटी - चींटी, पागी - चिपकना।
प्रसंग:-
उधौ तुम हो अति बड़भागी प्रसंग कक्षा दसवीं विषय हिंदी पुस्तक क्षितिज में संकलित है। यह पद सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' में उल्लेखित है । सूरसागर में गोपियों एवं उद्धव की बातचीत (संवाद) को 'भ्रमरगीत' की संज्ञा दी गई है । यह पद भ्रमरगीत का ही अंश है। इस पद में गोपियां उद्धव को व्यंग्य रूप में अपना संदेश बता रही हैं ,
कि वे सगुण प्रेम में ही अपनी निष्ठा रखती हैं और वे श्रीकृष्ण को कदापि नहीं भूल सकती ।
व्याख्या
गोपियां उद्धव जी की प्रेम हीनता पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि हे ! उधो ! अर्थात उद्धव ! तुम तो बहुत ही भाग्यशाली हो , क्योंकि तुम प्रेम के बंधन से पूरी तरह से मुक्त हो, निर्लिप्त हो और अछूते हो । तुम्हारे मन में किसी भी प्रकार का अनुराग अर्थात आसक्ति श्री कृष्ण जी के प्रति नहीं हैं। जिस प्रकार कमल का पत्ता सदा ही जल के अंदर रहता है तथापि उसको पानी का एक दाग भी नहीं लगता , उस पर पानी की एक बूंद भी नहीं ठहरती और जिस प्रकार तेल की मटकी को यदि पानी में डुबो दें तो भी उस पर पानी की एक बूंद तक नहीं ठहरती , इसी प्रकार तुम भी श्री कृष्ण की जी के बहुत ही निकट रहते हो तथापि तुम उनसे प्रेम नहीं करते । सदा प्रेम बंधन से मुक्त बने रहते हो । तुमने तो आज तक कभी भी प्रेम रूपी नदी में अपना पैर पांव नहीं डुबोया । श्री कृष्ण जी का सुंदर रूप देख कर भी तुम्हारी आंखें उन पर मोहित नहीं हुई है । लेकिन हम तो भोली भाली नारियां हैं । हम तो उन पर मोहित हैं , उनके रूप माधुर्य पर आसक्त हैं , जैसे चींटी गुड़ पर आसक्त होकर उस से चिपक जाती है और फिर कभी भी छूट नहीं पाती और अंत में अपने प्राण त्याग देती हैं, वैसे ही हम भी श्री कृष्ण के प्रेम में आसक्त हैं, हम कभी भी उन्हें भूल नहीं सकती।
उधौ तुम हो अति बड़भागी पद का काव्य सौंदर्य :-
उपरोक्त पद में व्यंग्य भाव समाहित है
अलंकार :-
अनुप्रास अलंकार :- पुरइनि पात
ज्यौं जल ।
अंत्यानुप्रास अलंकार :-बड़भागी ,अनुरागी, दागी ,लागी, परागी, पागी ।
रूपक अलंकार :- प्रीति - नदी मैं
उदाहरण अलंकार :- ज्यौं जल माह तेल की गागरी, बूंद न ताको लागी ।
' पुरइनि पात ............न दागी' , में दृष्टांत अलंकार है।
भाषा :-ब्रज
रस :-वियोग श्रृंगार
गुण :-माधुर्य गुण
शब्द शक्ति :- लक्षणा शब्द शक्ति
काल :- भक्ति काल (कृष्ण काव्य परंपरा)
उधौ तुम हो अति बड़भागी पद की व्याख्या के लिए उपरोक्त दिए गए लिंक पर क्लिक करें। उपरोक्त पद की व्याख्या एवं सरलार्थ से संबंधित आपके जो भी प्रश्नन है उन्हेंंं कमेंट बॉक्स में लिखें ।
वाह
जवाब देंहटाएं